स्व०अखिलेश सिंह का अंतिम संस्कार एवं यादें: *झकझकोर गया राबिनहुड का यू चले जाना* *एक अपराजेय योद्धा का अवसान* "धीरज श्रीवास्तव पत्रकार" रायबरेली। उत्तरप्रदेश की राजनीति में अखिलेश सिंह रॉबिनहुड के नाम से मशहूर थे, वही उनके कई साथी विधायक गांधी जी के नाम से उन्हें पुकारते थे । उनके दोस्त और दुश्मनो की लंबी सूची है, उन पर करीब 45 आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। इसके बावजूद जनता का एक बड़ा वर्ग उनमें अपने मसीहा की छवि देखता था, अपने रणनीतिक कौशल से जनपद की राजनीति में वह सदर विधानसभा सीट पर नेहरू परीवार पर भी भारी पड़े। श्रीमती सोनिया गांधी व प्रियंका वाड्रा भी उन्हें चुनाव में घेरने के बाद भी अपने कांग्रेसी उम्मीदवारों की जमानत बचाने में असमर्थ हुई, जनपद में उनके चाहने वालो का बड़ा वर्ग उनके पीछे उनकी निंदा भर्त्सना बर्दास्त नही करता था। लोग उन्हें बेइंतहा प्यार करते थे। चर्चित सैयद मोदी हत्याकांड में भी अखिलेश सिंह का नाम आया बाद में वह न्यायालय से बरी कर दिये गए। उनके निधन से शहर हो या ग्रामीण इलाके हर वर्ग में उदासी, एक अपने के चले जाने का दर्द, आंखों में दिखाई दे रहे आसुओ से महसूस किया गया। अखिलेश सिंह ने अपना राजनीतिक सफर कांग्रेस से प्रारम्भ किया, वह पहला चुनाव उसके सिम्बल पर जीते ठेकेदारी व रंगदारी के विवाद में चर्चित राकेश पांडेय हत्याकांड के आरोप उन पर लगने के बाद उन्हें कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया। उसके बाद लगातार दो चुनावो में अखिलेश सिंह को हराने के लिए कांग्रेस व सोनिया परिवार ने खूब जोर लगाया। सोनिया गांधी और प्रियंका ने घर-घर घूम घूमकर वोट मांगे, लेकिन अखिलेश सिंह की जीत का अंतर भी वह नही घटा सकी। 2007 में विधानसभा चुनाव में रायबरेली की पांच में से चार सीट कांग्रेस ले गई, लेकिन रायबरेली सदर में अखिलेश सिंह की जड़े इतनी मजबूत थी कि वह बड़े अंतर से निर्दलीय चुनाव जीते। 2016 में उन्हें कांग्रेस में वापस लाने के प्रयास हुए लेकिन वह कांग्रेस में नही गए। उनकी बेटी आदिति सिंह प्रियंका के विशेष आग्रह पर शामिल होकर कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़कर अपने पिता की सीट से विधायक बनी, जिसके बाद अखिलेश सिंह की राजनीतिक विरासत बेटी के हाथों में आ गयी। सदर विधायक अखिलेश सिंह का हर गली मोहल्ले में व्यक्तिगत नेटवर्क के साथ जनता से सीधा संपर्क और संवाद था। वह समय समय पर हर तरह से मदद के लिये तैयार रहते थे , जिसके बल पर उन्हें राजनीति में कभी पराजय का सामना नही करना पड़ा। सच में वह राजनीति के अपराजेय योद्धा थे। जिन्हें हराने की हसरत उनके चिरविरोधियो के दिलो में रह गयी, जनपद की राजनीति का अदभुत सितारा अपने शत्रुओं राजनीतिक विरोधियों से अकेले लड़ता और जनता की पीड़ा हरता रहा जबकि कांग्रेस, सपा, भाजपा व बसपा के कद्दावर नेता एक साथ समूह बनाकर उनकी राजनीति को खत्म करने का षड्यंत्र लगातार रचते थे । उन्होंने किसी की परवाह किये बिना अपनी इच्छानुसार जनता की पूंजी के बल पर आयाम पर आयाम स्थापित किये। *नेता जी से प्रेरित थे* लगभग चार दर्जन मुकदमो व माफिया की छवि के बाद भी वह समाज के सभी वर्गों के चहेते थे। उनके जीते जी सब ठीक है, कहने वाली रायबरेली को इस बात का भी गर्व है कि सदर विधायक जी के नाम से चर्चित अखिलेश सिंह के जीवन पर नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का व्यापक प्रभाव था वह सुभाष बाबू के जीवन से जुड़े लेखों पुस्तको का बार बार अध्यन करते थे। साथी विधायको से भी नेता जी के साथ सरदार भगत सिंह व स्वामी विवेकानंद के साहित्य व जीवनियों को पढ़ने के लिये प्रेरित करते थे और कहते थे कि देश के पास गर्व करने लायक तीन अनमोल हीरे है, जिनकी जीवनी प्रेरणादायक है, कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने नेता जी के पौत्र को जनपद में विशाल रैली आयोजित कर अतिथि के रूप में सम्मानित किया था और नेता जी की संदिगध मौत के मामले की जांच की मांग की थी। *370 हटाने का किया समर्थन* अपनी मृत्यु से 15 दिन पूर्व अखिलेश सिंह ने कहा था कि उन्होंने बचपन मे सपना देखा था कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया जाए। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक है। अनुच्छेद 370 पंडित जवाहरलाल नेहरू की जानबूझकर की गई ऐतिहासिक भूल थी। यह एक गलत फैसला था, महाराजा हरी सिंह ने जम्मू कश्मीर राज्य का भारत में पूर्ण विलय किया था। अनुच्छेद 370 व 35 ए हटने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व ग्रह मंत्री अमित शाह को बधाई देकर कहा था देश को विभाजित करने वाले अनुच्छेद को हटाकर देश को एक कर दिया है। उन्होंने इस मुद्दे पर कांग्रेस को आड़े हाथ लेते हुए कहा था कि देश पहले है, उसे देशद्रोह की भाषा नहीं बोलनी चाहिए कांग्रेस ने देश को बंटवाया कांग्रेस की भाषा पाकिस्तान की भाषा है। आज पूरे देश में जश्न है, इस जश्न को कांग्रेस किरकिरा करने के पाप से बचे, अपने विचार, अपने कहे और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले योद्धा ने मिल के पत्थर स्थापित किये। अब देखना है उनकी राजनीतिक वारिस उनकी पुत्री आदिति सिंह अपने पिता की स्वर्णिम विरासत को कितना आगे बढाती है। *'विधायक जी' के नाम से मशहूर अखिलेश सिंह का निधन,वो काफी वक्त से थे बीमार* रायबरेली में 'विधायक जी' के नाम से मशहूर अखिलेश सिंह नहीं रहे, लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया है। रायबरेली सदर विधानसभा सीट से उनकी बेटी अदिति सिंह कांग्रेस की विधायक हैं। पिछले लंबे वक्त से अखिलेश बीमार चल रहे थे और यही कारण था कि उन्होंने अपनी बेटी को राजनीति के मैदान में उतारा था। *रायबरेली में हनक* रायबरेली वैसे तो कांग्रेस और सोनिया गांधी के कारण जाना जाता है लेकिन जब बात रायबरेली सदर की हो तो यहां केवल और केवल अखिलेश सिंह का ही सिक्का चलता रहा है। रायबरेली लखनऊ से सटा है और वीआईपी इलाका है। 1951 में फिरोज़ गांधी यहां से चुनाव जीते थे, 1967 में इंदिरा. बीच में थोड़ा उठापटक जरूर हुई लेकिन 2004 से अभी तक सोनिया गांधी यहां से सांसद हैं। सदर विधायका अदिति सिंह से मिल ने जिला मजिस्ट्रेट नेहा शर्मा व सुनील सिंह पुलिस अधीक्षक भी पहुंचे और स्व०अखिलेश सिंह को पुष्प चढ़ाये। *रायबरेली सदर सीट से जनप्रिय लोकप्रिय पूर्व सदर विधायक अखिलेश सिंह जी की अंतिम यात्रा* उनके पेत्रक गांव लालूपुर चौहान से तकिया चौराहा से रतापुर रतापुर से त्रिपुला त्रिपुला से रायपुर होते हुए धुन्नी सिंह नगर जहानाबाद चौकी कहारो का अड्डा कैपरगज घंटाघर चौराहा सुपर मार्केट अस्पताल चौराहा से डिग्री कॉलेज चौराहा सिविल लाइन से मुंशीगंज मुंशीगंज से डलमऊ के लिए अंतिम संस्कार के लिये लेजाया गया।वहाँ पे अपार भीड़ के बीच अंतिम संस्कार कर दिया गया।


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*--1918 में पहली बार इस्तेमाल हुआ ''हिन्दू'' शब्द !--* *तुलसीदास(1511ई०-1623ई०)(सम्वत 1568वि०-1680वि०)ने रामचरित मानस मुगलकाल में लिखी,पर मुगलों की बुराई में एक भी चौपाई नहीं लिखी क्यों ?* *क्या उस समय हिन्दू मुसलमान का मामला नहीं था ?* *हाँ,उस समय हिंदू मुसलमान का मामला नहीं था क्योंकि उस समय हिन्दू नाम का कोई धर्म ही नहीं था।* *तो फिर उस समय कौनसा धर्म था ?* *उस समय ब्राह्मण धर्म था और ब्राह्मण मुगलों के साथ मिलजुल कर रहते थे,यहाँ तक कि आपस में रिश्तेदार बनकर भारत पर राज कर रहे थे,उस समय वर्ण व्यवस्था थी।तब कोई हिन्दू के नाम से नहीं जाति के नाम से पहचाना जाता था।वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य से नीचे शूद्र था सभी अधिकार से वंचित,जिसका कार्य सिर्फ सेवा करना था,मतलब सीधे शब्दों में गुलाम था।* *तो फिर हिन्दू नाम का धर्म कब से आया ?* *ब्राह्मण धर्म का नया नाम हिन्दू तब आया जब वयस्क मताधिकार का मामला आया,जब इंग्लैंड में वयस्क मताधिकार का कानून लागू हुआ और इसको भारत में भी लागू करने की बात हुई।* *इसी पर ब्राह्मण तिलक बोला था,"क्या ये तेली, तम्बोली,कुणभठ संसद में जाकर हल चलायेंगे,तेल बेचेंगे ? इसलिए स्वराज इनका नहीं मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है यानि ब्राह्मणों का। हिन्दू शब्द का प्रयोग पहली बार 1918 में इस्तेमाल किया गया।* *तो ब्राह्मण धर्म खतरे में क्यों पड़ा ?* *क्योंकि भारत में उस समय अँग्रेजों का राज था,वहाँ वयस्क मताधिकार लागू हुआ तो फिर भारत में तो होना ही था।* *ब्राह्मण की संख्या 3.5% हैं,अल्पसंख्यक हैं तो राज कैसे करेंगे ?* *ब्राह्मण धर्म के सारे ग्रंथ शूद्रों के विरोध में,मतलब हक-अधिकार छीनने के लिए,शूद्रों की मानसिकता बदलने के लिए षड़यंत्र का रूप दिया गया।* *आज का OBC ही ब्राह्मण धर्म का शूद्र है। SC (अनुसूचित जाति) के लोगों को तो अछूत घोषित करके वर्ण व्यवस्था से बाहर रखा गया था।* *ST (अनुसूचित जनजाति) के लोग तो जंगलों में थे उनसे ब्राह्मण धर्म को क्या खतरा ? ST को तो विदेशी आर्यों ने सिंधु घाटी सभ्यता संघर्ष के समय से ही जंगलों में जाकर रहने पर मजबूर किया उनको वनवासी कह दिया।* *ब्राह्मणों ने षड़यंत्र से हिन्दू शब्द का इस्तेमाल किया जिससे सबको को समानता का अहसास हो लेकिन ब्राह्मणों ने समाज में व्यवस्था ब्राह्मण धर्म की ही रखी।जिसमें जातियाँ हैं,ये जातियाँ ही ब्राह्मण धर्म का प्राण तत्व हैं, इनके बिना ब्राह्मण का वर्चस्व खत्म हो जायेगा।* *इसलिए तुलसीदास ने मुसलमानों के विरोध में नहीं शूद्रों के विरोध में शूद्रों को गुलाम बनाए रखने के लिए लिखा !* *"ढोल गंवार शूद्र पशु नारी।ये सब ताड़न के अधिकारी।।"* *अब जब मुगल चले गये,देश में OBC-SC के लोग ब्राह्मण धर्म के विरोध में ब्राह्मण धर्म के अन्याय अत्याचार से दुखी होकर इस्लाम अपना लिया था* *तो अब ब्राह्मण अगर मुसलमानों के विरोध में जाकर षड्यंत्र नहीं करेगा तो OBC,ST,SC के लोगों को प्रतिक्रिया से हिन्दू बनाकर,बहुसंख्यक लोगों का हिन्दू के नाम पर ध्रुवीकरण करके अल्पसंख्यक ब्राह्मण बहुसंख्यक बनकर राज कैसे करेगा ?* *52% OBC का भारत पर शासन होना चाहिये था क्योंकि OBC यहाँ पर अधिक तादात में है लेकिन यहीं वर्ग ब्राह्मण का सबसे बड़ा गुलाम भी है। यहीं इस धर्म का सुरक्षाबल बना हुआ है,यदि गलती से भी किसी ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई तो यहीं OBC ब्राह्मणवाद को बचाने आ जाता है और वह आवाज़ हमेशा के लिये खामोश कर दी जाती है।* *यदि भारत में ब्राह्मण शासन व ब्राह्मण राज़ कायम है तो उसका जिम्मेदार केवल और केवल OBC है क्योंकि बिना OBC सपोर्ट के ब्राह्मण यहाँ कुछ नही कर सकता।* *OBC को यह मालूम ही नही कि उसका किस तरह ब्राह्मण उपयोग कर रहा है, साथ ही साथ ST-SC व अल्पसंख्यक लोगों में मूल इतिहास के प्रति अज्ञानता व उनके अन्दर समाया पाखण्ड अंधविश्वास भी कम जिम्मेदार नही है।* *ब्राह्मणों ने आज हिन्दू मुसलमान समस्या देश में इसलिये खड़ी की है कि तथाकथित हिन्दू (OBC,ST,SC) अपने ही धर्म परिवर्तित भाई मुसलमान,ईसाई से लड़ें,मरें क्योंकि दोनों ओर कोई भी मरे फायदा ब्राह्मणों को ही हैं।* *क्या कभी आपने सुना है कि किसी दंगे में कोई ब्राह्मण मरा हो ? जहर घोलनें वाले कभी जहर नहीं पीते हैं।*
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प०राम प्रसाद बिस्मिल जी हज़रो नमन: *“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” : कब और कैसे लिखा राम प्रसाद बिस्मिल ने यह गीत!* राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ का नाम कौन नहीं जानता। बिस्मिल, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की क्रान्तिकारी धारा के एक प्रमुख सेनानी थे, जिन्हें 30 वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार ने फाँसी दे दी। वे मैनपुरी षडयंत्र व काकोरी-कांड जैसी कई घटनाओं मे शामिल थे तथा हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सदस्य भी थे। भारत की आजादी की नींव रखने वाले राम प्रसाद जितने वीर, स्वतंत्रता सेनानी थे उतने ही भावुक कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी, इतिहासकार व साहित्यकार भी थे। बिस्मिल उनका उर्दू उपनाम था जिसका हिन्दी में अर्थ होता है ‘गहरी चोट खाया हुआ व्यक्ति’। बिस्मिल के अलावा वे राम और अज्ञात के नाम से भी लेख व कवितायें लिखते थे। *राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ की तरह अशफ़ाक उल्ला खाँ भी बहुत अच्छे शायर थे। एक रोज का वाकया है अशफ़ाक, आर्य समाज मन्दिर शाहजहाँपुर में बिस्मिल के पास किसी काम से गये। संयोग से उस समय अशफ़ाक जिगर मुरादाबादी की यह गजल गुनगुना रहे थे* “कौन जाने ये तमन्ना इश्क की मंजिल में है। जो तमन्ना दिल से निकली फिर जो देखा दिल में है।।” बिस्मिल यह शेर सुनकर मुस्करा दिये तो अशफ़ाक ने पूछ ही लिया- “क्यों राम भाई! मैंने मिसरा कुछ गलत कह दिया क्या?” इस पर बिस्मिल ने जबाब दिया- “नहीं मेरे कृष्ण कन्हैया! यह बात नहीं। मैं जिगर साहब की बहुत इज्जत करता हूँ मगर उन्होंने मिर्ज़ा गालिब की पुरानी जमीन पर घिसा पिटा शेर कहकर कौन-सा बड़ा तीर मार लिया। कोई नयी रंगत देते तो मैं भी इरशाद कहता।” अशफ़ाक को बिस्मिल की यह बात जँची नहीं; उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा- “तो राम भाई! अब आप ही इसमें गिरह लगाइये, मैं मान जाऊँगा आपकी सोच जिगर और मिर्ज़ा गालिब से भी परले दर्जे की है।” *उसी वक्त पंडित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने यह शेर कहा* “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। देखना है जोर कितना बाजु-कातिल में है?” यह सुनते ही अशफ़ाक उछल पड़े और बिस्मिल को गले लगा के बोले- “राम भाई! मान गये; आप तो उस्तादों के भी उस्ताद हैं।” आगे जाकर बिस्मिल की यह गज़ल सभी क्रान्तिकारी जेल से पुलिस की गाड़ी में अदालत जाते हुए, अदालत में मजिस्ट्रेट को चिढ़ाते हुए और अदालत से लौटकर वापस जेल आते हुए एक साथ गाया करते थे। बिस्मिल की शहादत के बाद उनका यह गीत क्रान्तिकारियों के लिए मंत्र बन गया था। न जाने कितने क्रांतिकारी इसे गाते हुए हँसते-हँसते फांसी पर चढ़ गए थे। पढ़िए राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा लिखा गया देशभक्ति से ओतप्रोत यह गीत – सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है? वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आस्माँ! हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है? एक से करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचीत, देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है। रहबरे-राहे-मुहब्बत! रह न जाना राह में, लज्जते-सेहरा-नवर्दी दूरि-ए-मंजिल में है। अब न अगले वल्वले हैं और न अरमानों की भीड़, एक मिट जाने की हसरत अब दिले-‘बिस्मिल’ में है । ए शहीद-ए-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार, अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफ़िल में है। खींच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद, आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है। सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है? है लिये हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर, और हम तैयार हैं सीना लिये अपना इधर। खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है, सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। हाथ जिनमें हो जुनूँ , कटते नही तलवार से, सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से, और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है , सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। हम तो निकले ही थे घर से बाँधकर सर पे कफ़न, जाँ हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम। जिन्दगी तो अपनी महमाँ मौत की महफ़िल में है, सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। यूँ खड़ा मकतल में कातिल कह रहा है बार-बार, “क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?” सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है? दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब, होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज। दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है! सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। जिस्म वो क्या जिस्म है जिसमें न हो खूने-जुनूँ, क्या वो तूफाँ से लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है। सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है। पं० राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ उनके इस लोकप्रिय गीत के अलावा ग्यारह वर्ष के क्रान्तिकारी जीवन में बिस्मिल ने कई पुस्तकें भी लिखीं। जिनमें से ग्यारह पुस्तकें ही उनके जीवन काल में प्रकाशित हो सकीं। ब्रिटिश राज में उन सभी पुस्तकों को ज़ब्त कर लिया गया था। पर स्वतंत्र भारत में काफी खोज-बीन के पश्चात् उनकी लिखी हुई प्रामाणिक पुस्तकें इस समय पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं। 16 दिसम्बर 1927 को बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय (अन्तिम समय की बातें) पूर्ण करके जेल से बाहर भिजवा दिया। 18 दिसम्बर 1927 को माता-पिता से अन्तिम मुलाकात की और सोमवार 19 दिसम्बर 1927 को सुबह 6 बजकर 30 मिनट पर गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी। राम प्रसाद बिस्मिल और उनके जैसे लाखो क्रांतिकारियों के बलिदान का देश सद्येव ऋणी रहेगा! जय हिन्द !
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हैप्पी दीपावली पर्व: लखनऊ,आज का दिन हमारे पौत्र असद अली,अशर अली पुत्र शबाब अली एवं गौहर अली पुत्र शादाब अली व आरिज़ अली पुत्र नौशाद अली के नाम दोस्तो ! *मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की वनवास पूरा कर एवं रावण का वध कर अयोध्या वापसी की ख़ुशी में मनाये जाने वाले पंचदिवसीय समृद्धिपर्व दीपावली की सभी भारती देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ* ❤💐❤ नायाब अली लखनवी (सम्पादक) *नायाब टाइम्स* "परिवारगण" "उत्तर प्रदेश" लखनऊ (भारत)
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अति दुःखद: *पूर्व विधायक आशा किशोर के पति का निधन* रायबरेली,सलोन विधान सभा के समाजवादी पार्टी की पूर्व विधायक आशा किशोर के पति श्याम किशोर की लंबी बीमारी के बाद लखनऊ के एक अस्पताल में निधन हो गया।इनकी उम्र लगभग 70 वर्ष की थी और पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे। स्व श्याम किशोर अपने पीछे पत्नी आशा किशोर सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गए है। श्याम किशोर की अंत्येष्टि पैतृक गांव सुखठा, दीन शाहगौरा में किया गया।इस अवसर पर सपा के वरिष्ठ नेता रामबहादुर यादव, विधायक डॉ मनोज कुमार पांडे, आरपी यादव, भाजपा सलोन विधायक दल बहादुर कोरी, राम सजीवन यादव, जगेश्वर यादव, राजेंद्र यादव,अखिलेश यादव राहुल निर्मल आदि ने पहुंचकर शोक संतृप्त परिवार को ढांढस बंधाया। कृत्य:नायाब टाइम्स
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यार: यारो के यार डॉ०एन०के०श्रीवास्तव "आज का दिन 2004 की दोस्ती के नाम मृत्यु लोक पे जिओ सालो साल ये रब से दुआ है दोस्त...!" Wishing you all a Merry Christmas🎅🏻 in adv.... !
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