देशमुख की जबानी मेवात की दास्तां: 🌙 ___मरकज़ निजामुद्दीन;ऐतिहासिक पृष्ठभूमि--* ----------------***----------------- सन् 1855ई0 में तबलीग़ी जमात के संस्थापक मौलाना मुहम्मद इल्यास (रह0) के अब्बा जान(पिता जी) मौलाना इस्माइल साहब, इलाहीबक्श के बच्चों को पढ़ाने के लिए कांधला से दिल्ली आए। इलाहीबक्श, बादशाह बहादुर शाह जफर के निजी चिकित्सक व समधि थे। ये वही इलाहीबक्श है जिसने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के लिए जासूसी की और किले के बहुत महत्वपूर्ण सूचनाएं अंग्रेजों तक पहुँचाई। यही नहीं बादशाह बहादुर शाह जफर को भी इसी ने गिरफ्तार करवाया था। जैसाकि होता है। 1857 की क्रांति की विफलता के बाद ,इलाहीबक्श भी अपराध बोध का शिकार हो गया और परेशान रहने लगा। काफी दिनों बाद इन्होंने अपनी परेशानी मौलाना मुहम्मद इस्माइल साहब को बताई। मौलाना ने उनका रूहानी इलाज किया,जिससे इलाहीबक्श को दिमागी सुकून मिला। इसके बाद इलाहीबक्श ने दिल्ली छोड़ दी और निजामुद्दीन आकर रहने लगे। यहाँ उन्होंने एक आलीशान बंगला बनवाया और उसके पास ही एक मस्जिद बनवाई, जो आगे चलकर बंगले वाली मस्जिद कहलाई। मस्जिद के साथ ही एक हुजरा बनवाया और मौलाना मुहम्मद इस्माइल को साहब मरहूम को मस्जिद की इमामत का जिम्मा सौंपा गया। उस समय मेवात से दिल्ली जाने के लिए पैदल का रास्ता वाया धौज व निजामुद्दीन था। मेवाती इसी रास्ते से मजदूरी करने दिल्ली जाते थे। मस्जिद के सामने मीठे पानी का कुआँ था। जहाँ मेवाती अपने साथ लाया खाना खाते , दोपहरी में पेड़ों के नीचे आराम करते और दिल्ली की ओर चल देते। एक दिन मौलाना इस्माइल अकेले थे। उन्होंने ज़ोहर की आज़ान दी और जमात के लिए किसी दूसरे आदमी का इन्तज़ार करने लगे। उल्लेखनीय है कि उस समय निजामुद्दीन के आस -पास आबादी नहीं थी,बस हजरत निजामुद्दीन औलिया की मजार थी जिसके दक्षिण की ओर दरगाह के खादिमों के मकान थे। बाकी चारों ओर जंगल था। मौलाना साहब आदमी की तलाश में मस्जिद से बाहर निकले तो उन्हें कुछ मेवाती आते हुए दिखाई दिये। मौलाना ने उन्हें रोका और नमाज़ की दावत दी। मगर मेवाती तो नमाज़ जानते ही नहीं थे।-- खैर मौलाना ने उन्हें वजू करवाया और फिर नमाज़ पढ़ाई। नाम के बाद उनसे पूछा, " कहाँ जा रहे हैं?" मेवातियों ने जवाब दिया," दिल्ली मजदूरी करने जा रहे हैं।" यह सुन कर मौलाना ने कहा," अगर तुम्हें मजदूरी यहीं दे दो जाए तो कर लोगे।" मेवातियों ने कहा," हमें तो मजदूरी करनी है, कहीं भी कर लेंगे ।" उस दिन से मौलाना रोजाना उन्हें नमाज़ सिखाते/पढ़ाते और शाम को मजदूरी दे देते। इसी तरह 15-20 दिन गुजर गए। एक दिन मेवातियों ने आपस में सलाह-मशविरा किया। " यार,मौलाना हमारे पास काम भी नहीं कराते और अच्छी-अच्छी बातें भी बताते हैं और मजदूरी भी पूरी देते हैं। यार, मौलाना सू बिना काम मजदूरी लेणो ठीक नांय।" इसके बाद उन्होंने मौलाना से मजदूरी लेने से मना कर दिया और उनसे लिए पैसे भी वापिस कर दिये। कुछ दिन बाद वे मौलाना को मेवात लेकर आए। फिरोजपुर नमक में उनका मुकाम रहा। उसके बाद मेवात कुछ बच्चे पढ़ने के लिए निजामुद्दीन गये। इस तरह बंगले वाली मस्जिद में निजामुद्दीन मदरसे की शुरूआत हुई। मौलाना मुहम्मद इस्माइल साहब की 1898 में वफ़ात हो जाने के बाद उनके बड़े बेटे मौलवी मुहम्मद अहमद ने निजामुद्दीन मदरसे को संभाला। वे भी मेवात आते-जाते रहे। मौलवी मुहम्मद अहमद की वफ़ात 1917 में हुईं। इस समय उनके सबसे छोटे भाई मौलवी मुहम्मद इल्यास साहब, मदरसा मुजाहिर-उल-उलूम,सहारनपुर में मुदर्रिस थे। मौलवी मुहम्मद अहमद की वफ़ात के बाद लोगों ने मौलवी मुहम्मद इल्यास साहब से दरख्वास्त की, कि अब आप अपने बाप और भाई के लगाये हुए पौधे को सींचने के लिए निजामुद्दीन चलें। मौलाना पहले तो तैयार नहीं हुए मगर जब लोगों ने ज्यादा इसरार किया तो आप निजामुद्दीन आ गये। मेवातियों को जब पता चला कि मौलवी इस्माइल साहब के छोटे बेटे निजामुद्दीन आ गये हैं तो वे बहुत खुश हुए और निजामुद्दीन उनसे मिलने पहुँच गये। कुछ दिन बाद मेवातियों ने मौलाना इल्यास साहब से मेवात चलने की दरख्वास्त की। मौलाना ने कहा,"एक शर्त पर मेवात चल सकता हूँ कि मेवात में एक मकतब(मदरसा) खोलने की हाँ करो तो ।" मेवातियों ने हाँ कर दी। उसके बाद मौलाना इल्यास साहब फिरोजपुर नमक आए और आते ही अपनी शर्त याद दिलाई। इसके बाद फिरोजपुर नमक में मेवात के पहले मकतब की स्थापना हुई। उसके बाद इसी सफर में कुल दस मकतब चालू किये गये। इस तरह कुछ ही दिनों में मेवात में सैकड़ों मकतब शुरू हो गई। मौलाना समय-समय पर इन मकतबों की प्रोग्रेस रिपोर्ट लेते। कुछ ही दिनों में मौलाना इस नतीजे पर पहुंचे कि सिर्फ मकतबों से मेवात की जहालत दूर नहीं हो सकती। इसके बाद उन्होंने मेवात का सर्वे कराया तो रिपोर्ट मिली कि मेवात में मस्जिदें बहुत कम हैं और जो हैं वे भी बन्द पड़ी हैं। नमाज तो क्या लोगों को कलमा भी याद नहीं है। लोग गैरइस्लामी परम्पराओं में इस कद्र फंसे हुए हैं कि वे असल इस्लाम से कोसों दूर हैं। इसी दौरान मौलाना के सामने एक नौजवान लाया गया। बताया गया ये लड़का फलां मकतब से फारिग है। उसका लिबास और चेहरा (दाढ़ी-मूंछ) सफा चट किसी तरह भी इस्लामी नहीं था। यह देख मौलाना को बड़ा दुःख हुआ। अब उन्हें यकीन हो गया कि सिर्फ मकतबों से मेवात की जहालत दूर नहीं हो सकती। इसी समय आप सन् 1932 में तीसरे हज के लिए मक्का गये। यहाँ आपको सपना देखा," आपसे काम लेना है।" सुबह उठे तो बहुत चिन्तित थे। आलिमों से तासीर पूछी। आलिमों ने ढाढ़स बंधाया। चिन्ता मत करो। आपसे काम ही लेना है। क्या काम लेना है वे खुद ले लेंगें। हज से वापिस आए,तो एक योजना बनाई। लोगों को मस्जिद तक लाएं और उनसे बात करें। उसके बाद 02 अगस्त, सन्1934 ई0 को नूँह में पूरे मेवात की एक पँचायत बुलाई गई। इस पँचायत में पूरे मेवात से 107 जिम्मेदार लोगों ने शिरकत की। पँचायत की अध्यक्षता मौलाना इल्यास साहब ने की। पँचायत में 15 प्रस्तावों पर सहमति बनी। मुख्य तौर मस्जिदें आबाद करना व नई मस्जिदें तामीर(निर्माण) करना,तालीम का इन्तजाम करना, मेव मर्द व औरतों के गैरशरअई(गैर इस्लामिक) लिबास को बदलना,आपस के झगड़ों को निपटाना, दहेज बन्द करना, दीन की दावत व तबलीग करना इत्यादि। धीरे-धीरे काम शुरू हुआ। तीन नियम बनाए गये। गश्त, नमाज, और तालीम। इसके बाद सन् 1939 में चिल्ले (40 दिन) की पहली जमाअत कांधला और फिर दूसरी जमाअत रायपुर भेजी गई। जमाअतों के लिए छ: बिन्दुओं पर काम करने के लिए जाना तय हुआ 1-कलमा (तौहीद)- कलमा याद करवाना, कलमे का मतलब क्या है और कलमे का महत्व क्या है। 2-नमाज़-नमाज सीखना,नमाज़ क्या है,नमाज़ का हमारे जीवन में महत्व क्या है। 3- हर मोमिन को कम से कम इतना इल्म सीखना चाहिए कि उसे हराम-हलाल ( वैध-अवैध) का ज्ञान हो जाए। 4-इकराम-ए-मुस्लिम-एक मुसलमान कैसा हो। उसका चरित्र, व्यवहार, मामलात व मासरात (लेन-देन) कैसे हों। 5-इखलास-ए-नियत 6-दावत-ए-तबलीग-सभी मुसलमानों को दीन की दावत दी जाए। इस तरह एक योजनाबद्ध तरीके से काम शुरू हुआ। जमाअत में जाने वालों के लिए भी नियम बने। वे मस्जिद में ठहरेंगे अमीर की बात मानेंगे सर नीचा करके चलेंगे धीरे बोलेंगे अपना माल व जान तथा समय लगाएंगे। कोई दुनियावी बात नहीं करेंगे। इस तरह जमाअत के लोग सिर्फ जमीन से नीचे (कब्र) की और आसमान से ऊपर (जन्नत-जहन्नुम) ही बात करते हैं। सियासत,साम्प्रदायिकता और संकीर्णता से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। शुरूआत में समाज सुधार पर काफी जोर दिया गया था। लोगों के आपसी झगडों को सुलझाना,बिना दहेज की शादियाँ करवाना,जिनका निकाह जलसों में हजरत जी खुद पढ़ाते थे इत्यादि। तबलीग ने न केवल अर्धसभ्य मेवों को सभ्य बनाया बल्कि उन्हें वास्तविक इस्लाम से रूबरू कराया और पूरी दुनिया में मेवात की एक नई पहचान कायम हुई। आपकी दुआओं का तालिब हकीम रियाज अहमद देशमुख.✍️


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कोरोना पोजेटिव: *स्वास्थ्य मंत्री ने जिला महिला, पुरुष चिकित्सालय का किया निरीक्षण,बेहतर सुविधा देने के लिये दिए सुझाव* रायबरेली, स्वास्थ्य मंत्री श्री जयप्रताप सिंह ने रायबरेली स्थित सरकारी महिला और परुष अस्पतालों में जाकर सुविधाओ का जायजा लिया,स्वास्थ्य मंत्री ने निरक्षण के दौरान मरीजों से भी बात-चीत कर मिलने बाली सुविधाओं का जायज़ा लिया। स्वास्थ्य मंत्री ने कोरोना से सुरक्षा के संबंध में भी मरीजों से जानकारी प्राप्त की,महिला अस्पताल में बंद पड़े अल्ट्रासाउंड मशीन को जल्द से जल्द ठीक कराने के सीएमओ को आदेश दिए। सीएमएस डॉ० एन०के०पांडेय ने बताया कि महिला चिकित्सालय के अल्ट्रासाउंड पास में स्थित परुष अस्पताल में कराए जा रहे है।इस दौरान सीएमओ डॉ संजय कुमार शर्मा,सीएमएस डॉ० एन के श्रीवास्तव, सीएमएस महिला डॉ०रेनू वर्मा, रेडियोलॉजिस्ट डॉ० अल्ताफ हुसैन मौजूद रहे। कृत्य:नायाब टाइम्स
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इनामी अपराधी हिरासत में: *हत्या की घटना में वांछित 15 हज़ार रुपयो का इनामी अभियुक्त गिरफ्तार* (सुनील सोनकर) रायबरेली बछरावां,तेजतर्रार कर्मठ रायबरेली पुलिस अधीक्षक श्लोक कुमार के आदेश के क्रम में अपराध एवं अपराधियों के विरुद्ध कृत कार्यवाही के अंतर्गत दिन सोमवार को मुखबिर की सूचना पर थानाध्यक्ष राकेश सिंह ने अपनी टीम उप निरीक्षक अनिल यादव, कांस्टेबल उदित राणा व जय शंकर यादव के साथ अमावा रेलवे क्रॉसिंग के पास से हत्या की घटना में वांछित इनामी अपराधी राकेश पुत्र रामसेवक उर्फ लल्ला निवासी रुस्तम खेड़ा थाना निगोहा जनपद लखनऊ को गिरफ्तार करने में सफलता प्राप्त की है। आपको बताते चलें कि विगत 10 माह पूर्व स्थानीय थाने पर मैंकू पुत्र सुखनंदन निवासी कन्नावा थाना बछरावां ने लिखित सूचना दी थी कि किसी अज्ञात वाहन द्वारा एक अज्ञात व्यक्ति को टक्कर मार दी गई है जिससे उसकी मृत्यु हो गई है इस सूचना पर थाना बछरावां में अभियोग पंजीकृत कर विवेचना प्रारंभ की गई, जिसके परिणाम स्वरूप मृतक की पहचान कुलदीप उर्फ छोटू पुत्र चंद्रशेखर निवासी रुस्तम खेड़ा मजरे रामदास पुर थाना निगोहा लखनऊ के रूप में हुई। तदोपरांत मृतक के भाई अजय ने लिखित तहरीर देकर बताया कि उसके भाई का गांव की एक विवाहित लड़की से प्रेम प्रसंग था जिसे उसका भाई लखनऊ लेकर चला गया था और वहां पर कुछ दिन दोनों ने साथ गुजारे थे, उसी लड़की से अंकित पुत्र योगेंद्र सिंह निवासी नदोली थाना निगोहा लखनऊ भी प्रेम करता था इसी बात को लेकर अंकित और मेरे भाई के बीच कहासुनी हुई थी तथा वह मेरे भाई से रंजीश भी रखता था। उसने यह भी बताया कि घटना के दिन दोपहर में मेरे भाई को अंकित मेरे घर से मोटरसाइकिल पर बिठाकर कहीं ले गया था जिसको गांव वालों ने भी देखा था, लड़की के पति अखिलेश पुत्र उदल निवासी लेसवा थाना लोनी कटरा जनपद बाराबंकी व ससुर उदल तथा लड़की के पिता राकेश पुत्र रामसेवक उर्फ लल्ला निवासी रुस्तम खेड़ा थाना निगोहा द्वारा साजिश करके अंकित द्वारा मेरे भाई की हत्या करा दी गई है। लिखित तहरीर के आधार पर उपरोक्त मुकदमे को परिवर्तित कर विवेचना प्रारंभ की गई। विवेचना के दौरान अखिलेश व उदल की घटना में संलिप्तता नहीं पाई गई। अभियुक्त अंकित व राकेश की गिरफ्तारी न होने पर संबंधित माननीय न्यायालय से गैर जमानती वारंट जारी किया गया। जिसके बाद भी गिरफ्तारी न होने पर उपरोक्त दोनों अभियुक्तों पर 15:15 हजार रुपए का इनाम घोषित किया था। विगत 22 जून 2020 को अभियुक्त अंकित की गिरफ्तारी की गई। जिसने पूछताछ करने पर बताया कि मैं कुलदीप को उसके घर से अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर चुरूवा बॉर्डर पर ले आया था जहां पर पहले से ही मैंने राकेश को बुला लिया था हम लोगों ने कुलदीप को शराब पिला दी तथा चापड़ से कई बार हमला करके मार दिया था जिसके पश्चात हम लोग वहां से भाग गए थे चापड़ को शारदा नहर में फेंक दिया था। पकड़े गए अभियुक्त पर विधिक कार्यवाही कर जेल भेज दिया गया है। कृत्य:नायाब टाइम्स
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प०राम प्रसाद बिस्मिल जी हज़रो नमन: *“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” : कब और कैसे लिखा राम प्रसाद बिस्मिल ने यह गीत!* राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ का नाम कौन नहीं जानता। बिस्मिल, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की क्रान्तिकारी धारा के एक प्रमुख सेनानी थे, जिन्हें 30 वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार ने फाँसी दे दी। वे मैनपुरी षडयंत्र व काकोरी-कांड जैसी कई घटनाओं मे शामिल थे तथा हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सदस्य भी थे। भारत की आजादी की नींव रखने वाले राम प्रसाद जितने वीर, स्वतंत्रता सेनानी थे उतने ही भावुक कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी, इतिहासकार व साहित्यकार भी थे। बिस्मिल उनका उर्दू उपनाम था जिसका हिन्दी में अर्थ होता है ‘गहरी चोट खाया हुआ व्यक्ति’। बिस्मिल के अलावा वे राम और अज्ञात के नाम से भी लेख व कवितायें लिखते थे। *राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ की तरह अशफ़ाक उल्ला खाँ भी बहुत अच्छे शायर थे। एक रोज का वाकया है अशफ़ाक, आर्य समाज मन्दिर शाहजहाँपुर में बिस्मिल के पास किसी काम से गये। संयोग से उस समय अशफ़ाक जिगर मुरादाबादी की यह गजल गुनगुना रहे थे* “कौन जाने ये तमन्ना इश्क की मंजिल में है। जो तमन्ना दिल से निकली फिर जो देखा दिल में है।।” बिस्मिल यह शेर सुनकर मुस्करा दिये तो अशफ़ाक ने पूछ ही लिया- “क्यों राम भाई! मैंने मिसरा कुछ गलत कह दिया क्या?” इस पर बिस्मिल ने जबाब दिया- “नहीं मेरे कृष्ण कन्हैया! यह बात नहीं। मैं जिगर साहब की बहुत इज्जत करता हूँ मगर उन्होंने मिर्ज़ा गालिब की पुरानी जमीन पर घिसा पिटा शेर कहकर कौन-सा बड़ा तीर मार लिया। कोई नयी रंगत देते तो मैं भी इरशाद कहता।” अशफ़ाक को बिस्मिल की यह बात जँची नहीं; उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा- “तो राम भाई! अब आप ही इसमें गिरह लगाइये, मैं मान जाऊँगा आपकी सोच जिगर और मिर्ज़ा गालिब से भी परले दर्जे की है।” *उसी वक्त पंडित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने यह शेर कहा* “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। देखना है जोर कितना बाजु-कातिल में है?” यह सुनते ही अशफ़ाक उछल पड़े और बिस्मिल को गले लगा के बोले- “राम भाई! मान गये; आप तो उस्तादों के भी उस्ताद हैं।” आगे जाकर बिस्मिल की यह गज़ल सभी क्रान्तिकारी जेल से पुलिस की गाड़ी में अदालत जाते हुए, अदालत में मजिस्ट्रेट को चिढ़ाते हुए और अदालत से लौटकर वापस जेल आते हुए एक साथ गाया करते थे। बिस्मिल की शहादत के बाद उनका यह गीत क्रान्तिकारियों के लिए मंत्र बन गया था। न जाने कितने क्रांतिकारी इसे गाते हुए हँसते-हँसते फांसी पर चढ़ गए थे। पढ़िए राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा लिखा गया देशभक्ति से ओतप्रोत यह गीत – सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है? वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आस्माँ! हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है? एक से करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचीत, देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है। रहबरे-राहे-मुहब्बत! रह न जाना राह में, लज्जते-सेहरा-नवर्दी दूरि-ए-मंजिल में है। अब न अगले वल्वले हैं और न अरमानों की भीड़, एक मिट जाने की हसरत अब दिले-‘बिस्मिल’ में है । ए शहीद-ए-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार, अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफ़िल में है। खींच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद, आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है। सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है? है लिये हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर, और हम तैयार हैं सीना लिये अपना इधर। खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है, सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। हाथ जिनमें हो जुनूँ , कटते नही तलवार से, सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से, और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है , सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। हम तो निकले ही थे घर से बाँधकर सर पे कफ़न, जाँ हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम। जिन्दगी तो अपनी महमाँ मौत की महफ़िल में है, सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। यूँ खड़ा मकतल में कातिल कह रहा है बार-बार, “क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?” सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है? दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब, होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज। दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है! सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। जिस्म वो क्या जिस्म है जिसमें न हो खूने-जुनूँ, क्या वो तूफाँ से लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है। सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है। पं० राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ उनके इस लोकप्रिय गीत के अलावा ग्यारह वर्ष के क्रान्तिकारी जीवन में बिस्मिल ने कई पुस्तकें भी लिखीं। जिनमें से ग्यारह पुस्तकें ही उनके जीवन काल में प्रकाशित हो सकीं। ब्रिटिश राज में उन सभी पुस्तकों को ज़ब्त कर लिया गया था। पर स्वतंत्र भारत में काफी खोज-बीन के पश्चात् उनकी लिखी हुई प्रामाणिक पुस्तकें इस समय पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं। 16 दिसम्बर 1927 को बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय (अन्तिम समय की बातें) पूर्ण करके जेल से बाहर भिजवा दिया। 18 दिसम्बर 1927 को माता-पिता से अन्तिम मुलाकात की और सोमवार 19 दिसम्बर 1927 को सुबह 6 बजकर 30 मिनट पर गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी। राम प्रसाद बिस्मिल और उनके जैसे लाखो क्रांतिकारियों के बलिदान का देश सद्येव ऋणी रहेगा! जय हिन्द !
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पराली न जलाए: *पराली और कृषि अपशिष्ट आदि सहित फसलों के ठंडल भी न जलाये अन्यथा होगी दण्डात्मक कार्यवाही:वैभव श्रीवास्तव* रायबरेली,जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव ने मा0 राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण द्वारा फसल अवशेष/पराली जलाने को दण्डनीय अपराध घोषित करने की सूचना के बाद भी जनपद के कुछ किसानों द्वारा पराली जलाने की अप्रिय घटनाए घटित की जा रही है, जिसके क्रम में उत्तर प्रदेश शासन के साथ ही मा0 उच्चतम न्यायालय एवं मा0 हरित न्यायालयकरण (एन0जी0टी0) द्वारा कड़ी कार्यवाही करने के निर्देश दिये गये है, जनपद के समस्त कृषकों एवं जनपदवासी पराली (फसल अवशेष) या किसी भी तरह का कूड़ा, जलाने की घटनाये ग्रामीण एंव नगरी क्षेत्र घटित होती है तो ऐसे व्यक्तियों के विरूद्ध आर्थिक दण्ड एवं विधिक कार्यवाही के साथ ही उनकों देय समस्त शासकीय सुविधाओं एवं अनुदान समाप्त करते हुए यदि वे किसी विशेष लाइसेंस (निबन्धन) के धारक है तो उसे भी समाप्त किया जायेगा और ग्राम पंचायत निर्वाचन हेतु अदेय प्रमाण पत्र भी नही दिया जायेगा। इसके साथ ही घटित घटनाओं से सम्बन्धित ग्राम प्रधान, राजस्वकर्मी, लेखपाल, ग्राम पंचायत अधिकारी एवं ग्राम विकास अधिकारी तथा कृषि विभाग के कर्मचारी एवं पुलिस विभाग से सम्बन्धित हल्का प्रभारी के विरूद्ध कठोर दण्डात्मक कार्यवाही की जायेगी। मा0 राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेश में कृषि अपशिष्ट को जलाये जाने वाले व्यक्ति के विरूद्ध नियमानुसार अर्थदण्ड अधिरोपित किये जाने के निर्देश है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण द्वारा राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम की धारा-15 के अन्तर्गत पारित उक्त आदेशों का अनुपालन अत्यन्त आवश्यक है अन्यथा इसी अधिनियम की धारा 24 के अन्तर्गत आरोपित क्षतिपूर्ति की वसूली और धारा-26 के अन्तर्गत उल्लघंन की पुनरावित्त होने पर करावास एवं अर्थदण्ड आरोपित किया जाना प्राविधनित है एवं एक्ट संख्या 14/1981 की धारा 19 के अन्तर्गत अभियोजन की कार्यवाही कर नियमानुसार कारावास या अर्थदण्ड या दोनों से दण्डित कराया जायेगा। उक्त आदेश के अनुपालन में लेखपाल द्वारा क्षतिपूर्ति की वसूली की धनराशि सम्ब.न्धित से भू-राजस्व के बकाया की भांति की जायेगी। ग्राम सभा की बैठक में पराली प्रबन्धन एवं पराली एवं कृषि अपशिष्ट जैसे गन्ने की पत्ती/गन्ना, जलाने पर लगने वाले अर्थदण्ड एवं विधिक कार्यवाही के बारे में बताया कि कोई भी व्यक्ति कृषि अपशिष्ट को नही जलायेगा तथा कृषि अपशिष्ट जलाने पर तत्काल सम्बन्धित थाने पर सूचना दी जायेगी एवं आर्थिक दण्ड विधिक कार्यवाही करायी जायेगी। जिलाधिकारी ने कहा है कि किसान पराली व कृषि अपशिष्ट जैसे गन्ने की सूखी पत्ती या फसलों के डंठल इत्यादि न जलायें। पराली और कृषि अपशिष्ट न जलाने पर तहसील व विकास खण्ड, ग्राम स्तरों पर जागरूकता कार्यक्रम चलाकर आम आदमी को जागरूक भी किया जाये। उन्होंने कहा कि पराली जलाने पर पूरी तरह से शासन द्वारा पाबंदी लगाई गई है। शासन के निर्देशानुसार जनपद में पराली जाने पर कड़ी से अनुपालन भी कराया जा रहा है। कृत्य:नायाब टाइम्स *अस्लामु अलैकुम/शुभरात्रि*
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सम्मान पत्र: *इप्सेफ द्वारा कोरोना वारियर्स के रूप में सैकड़ों कर्मचारियों को सम्मान पत्र* लखनऊ, डॉ०श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविल चिकित्सालय के डॉ०डी०एस०नेगी "निदेशक", डॉ०आर०के०पोरवाल "मुख्य चिकित्सा अधीक्षक", डॉ०आशुतोष कुमार दुबे "चिकित्सा अधीक्षक,डॉक्टर" एवं पैरामेडिकल स्टाफ, नान पैरामेडिकल स्टाफ,कंप्यूटर ऑपरेटर, सफाई कर्मचारी, रोडवेज कर्मचारी,मीडिया कर्मचारी, पुलिस विभाग को इप्सेफ द्वारा कोरोना वारियर्स के रूप में सम्मानित किया गया। *इप्सेफ* के सुरेश रावत "अध्यक्ष",अतुल मिश्रा ,वी पी मिश्रा और सुनील यादव का सभी ने धन्यवाद ज्ञापित किया जो उन्होंने *कोरोना वॉरियर्स* सम्मान पत्र देकर सैकड़ों कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाया। कृत्य:नायाब टाइम्स
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